‘स्पर्श हिमालय महोत्सव 2025’ में बोले: भारत की असली सुंदरता उसकी विविधता में,
‘लेखक गांव’ पहल को बताया सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक
Dehradun, 03 November: केंद्रीय संसदीय कार्य एवं अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरन रिजिजू ने कहा कि हिमालय केवल पर्वत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, शक्ति और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। यह पर्वत श्रृंखला हमारे देश की सीमाओं की रक्षा करने के साथ-साथ हमारी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत की भी पहरेदार है। वे सोमवार को देहरादून के थानो स्थित ‘लेखक गांव’ में आयोजित ‘स्पर्श हिमालय महोत्सव 2025’ में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। इस वर्ष महोत्सव का विषय था— “अंतर्राष्ट्रीय साहित्य, संस्कृति एवं कला महोत्सव”। कार्यक्रम के दौरान भगवान धनवंतरि की प्रतिमा का लोकार्पण भी किया गया। यह आयोजन उत्तराखंड राज्य के गठन की रजत जयंती (25 वर्ष) और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के स्वप्न ‘लेखक ग्राम’ की 25वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में हुआ।

“लेखक गांव भारत की रचनात्मक आत्मा का प्रतीक”
किरन रिजिजू ने कहा कि वे स्वयं अरुणाचल प्रदेश से होने के कारण हिमालय से गहरे भावनात्मक रूप से जुड़े हैं। उनके अनुसार हिमालय भारत के आध्यात्मिक और पारिस्थितिक संतुलन का केंद्र है। उन्होंने कहा कि भारत की असली सुंदरता इसकी विविधता में है। भाषाएं और परंपराएं अलग हो सकती हैं, लेकिन हमारे संस्कार हमें एक सूत्र में बांधते हैं।
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गुंजी, माणा, नेलांग और तवांग सीमांत क्षेत्रों में हो रहे सड़क और अवसंरचना विकास कार्यों की सराहना की। उनके अनुसार, ये पहलें न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ कर रही हैं बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था, पर्यटन और शिक्षा को भी नई दिशा दे रही हैं।
रिजिजू ने कहा कि हमारा संविधान लोकतंत्र को दिया गया मानवता का सबसे बड़ा उपहार है, जो हमारी करुणा और एकता का जीवंत प्रतीक है।
ग्राम भारत ही नया भारत बनेगा
पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने केंद्रीय मंत्री का स्वागत करते हुए कहा कि ‘स्पर्श हिमालय महोत्सव’ उत्तराखंड की आत्मा को हिमालय की ऊँचाइयों से जोड़ने का प्रयास है।
उन्होंने कहा कि अटल जी का ‘ग्राम भारत’ का स्वप्न अब सांस्कृतिक पुनर्जागरण के रूप में मूर्त हो रहा है। लेखक ग्राम का उद्देश्य गांवों को शिक्षा, संस्कृति और रचनात्मकता के केंद्रों के रूप में विकसित करना है।
पतंजलि और एनईपी की भावना का संगम
आचार्य बालकृष्ण, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, पतंजलि योगपीठ ने कहा कि हिमालय केवल भौगोलिक धरोहर नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य, संतुलन और औषधीय संपदा का आधार है। उन्होंने बताया कि पतंजलि हिमालयी औषधियों और पारिस्थितिकी संरक्षण के लिए कई शोध कार्य कर रहा है।
प्रो. अनिल सहस्रबुद्धे, अध्यक्ष, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान परिषद ने कहा कि ‘लेखक गांव’ की अवधारणा नई शिक्षा नीति (एनईपी) की भावना से मेल खाती है। यह पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने का जीवंत उदाहरण है।
अंतरराष्ट्रीय सहभागिता से बढ़ा महोत्सव का गौरव
महोत्सव में इंडोनेशिया से आए प्रो. सोमवीर ने भारत की लोकतांत्रिक भूमिका और जनसहभागिता की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि भारत ने स्वच्छता अभियान जैसे आंदोलनों से विश्व को नागरिक जिम्मेदारी का आदर्श दिखाया है।
पद्मश्री डॉ. बी.के. संजय (एम्स, गुवाहाटी) ने कहा कि हिमालयी परंपराएं केवल भौतिक स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक स्थिरता का भी आधार हैं।
सेवा ही सच्चा अध्यात्म
आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने अपने आशीर्वचन में कहा कि जीवन का सार सेवा, अनुशासन और समर्पण में निहित है। उन्होंने कहा, “हिमालय हमें सत्य, निष्ठा और शुचिता का पाठ पढ़ाता है — यही मानवता की असली पहचान है।”
कार्यक्रम के समापन पर प्रो. पृथ्वीराज, उपाध्यक्ष ने डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को हिमालयी और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में योगदान के लिए सम्मानित किया।
धन्यवाद ज्ञापन में डॉ. निशंक ने कहा कि केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू के विचारों ने हिमालय और भारतीय जनमानस के बीच के गहरे भावनात्मक संबंध को एक बार फिर जीवंत कर दिया है।
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