हेलमेट में लोकतंत्र: सोनारपुर की घटना और Abhishek Banerjee पर हमले के सियासी मायने

हेलमेट में लोकतंत्र: सोनारपुर की घटना और Abhishek Banerjee पर हमले के सियासी मायने

Abhishek Banerjee सोनारपुर हमला: जब सांसद को पहनाना पड़ा पुलिस हेलमेट, क्या बंगाल में हावी है भीड़तंत्र?

Kolkata/Sonarpur, 30 May 2026:

पश्चिम बंगाल में चुनाव खत्म हो चुके हैं, नतीजे आ चुके हैं, लेकिन जमीन पर सियासी नफरत और मारपीट का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। दक्षिण 24 परगना के सोनारपुर (Sonarpur) इलाके से जो तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, वे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (ट्विटर) पर इस समय सबसे बड़ा हॉट टॉपिक बने हुए हैं। टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee) के काफिले पर जिस तरह का हमला हुआ, वह केवल एक नेता की सुरक्षा में चूक का मामला नहीं है। यह असल में बंगाल की राजनीति में घर कर चुकी उस कड़वाहट का सबूत है, जहां चुनाव बीत जाने के बाद भी खून-खराबा और बदले की भावना शांत नहीं होती।

हैरानी की बात यह है कि अभिषेक बनर्जी वहां चुनाव के बाद हुई हिंसा (Post-Poll Violence) के शिकार परिवारों से ही मिलने पहुंचे थे। लेकिन वहां उन्हें खुद ऐसी उग्र भीड़ का सामना करना पड़ा जिसने उनके काफिले पर अंडे, जूते और पत्थर बरसा दिए।

सोनारपुर की ग्राउंड रियलिटी और X पर छिड़ी ‘वीडियो वॉर’

सोनारपुर में जो कुछ भी घटा, उसकी सबसे विचलित करने वाली बात वह थी जब सुरक्षाकर्मियों को अभिषेक बनर्जी की जान बचाने के लिए उन्हें जबरन पुलिस हेलमेट पहनाना पड़ा। इंटरनेट पर इस ‘हेलमेट’ वाले वीडियो ने एक नई बहस छेड़ दी है और सोशल मीडिया दो हिस्सों में बंट गया है:

  • विपक्ष (BJP और अन्य दल): विपक्षी समर्थकों का कहना है कि यह कोई प्लानिंग के तहत किया गया हमला नहीं था। यह तो चुनाव के बाद हुई हिंसा से तंग आ चुकी स्थानीय जनता, खासकर महिलाओं का असली गुस्सा था, जो ‘चोर-चोर’ के नारों के साथ सड़क पर फूट पड़ा।

  • सत्तारूढ़ दल (TMC): दूसरी तरफ, तृणमूल कांग्रेस का सीधा आरोप है कि यह हमला विपक्ष की एक सोची-समझी साजिश है, जिसका मकसद चुनाव नतीजों के बाद जानबूझकर माहौल खराब करना और राज्य की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाना है।

जब हिंसा को ‘नॉर्मल’ मान लिया जाए

बंगाल के सियासी इतिहास को करीब से जानने वाले लोग बखूबी समझते हैं कि यहां चुनावी हिंसा कोई नई बात नहीं है। लेकिन सबसे डरावनी बात यह है कि अब लोग इस हिंसा को बहुत ‘नॉर्मल’ बात मानने लगे हैं।

सोचने वाली बात यह है कि जब सूबे की सत्ताधारी पार्टी के दूसरे सबसे बड़े वीआईपी नेता को जनता के बीच जाने के लिए पुलिस हेलमेट की आड़ लेनी पड़ रही हो, तो वहां गांवों में रहने वाले आम कार्यकर्ताओं की जान-माल की क्या गारंटी होगी? लोकतंत्र में हर किसी को अपनी नाराजगी जताने और विरोध करने का पूरा हक है, लेकिन जब यह विरोध पत्थरों और जानलेवा हमले की शक्ल ले ले, तो उसे लोकतंत्र नहीं बल्कि सीधे-सीधे भीड़तंत्र कहा जाएगा।

सीआईडी का समन और उसी दिन यह हमला: महज एक इत्तेफाक?

इस पूरी कहानी में एक और पेंच है। जिस दिन सोनारपुर में अभिषेक बनर्जी के साथ यह घटना हुई, ठीक उसी सुबह राज्य की सीआईडी (CID) द्वारा उन्हें एक पुराने मामले में पूछताछ का नोटिस भेजने की खबरें भी मीडिया में तैर रही थीं। जांच एजेंसियों के चक्कर और दूसरी तरफ सड़कों पर उतरती उग्र भीड़—यह पूरा माहौल साफ दिखाता है कि बंगाल में राजनीति अब मुद्दों की पटरी से उतरकर निजी दुश्मनी और बदले के खेल में तब्दील हो चुकी है।

जब पार्टियों के बीच बातचीत के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं और फैसले केवल थानों की फाइलों या सड़कों पर उड़ते पत्थरों से होने लगते हैं, तो विकास, रोजगार और शिक्षा जैसे असली जन-मुद्दे अपने आप गायब हो जाते हैं।

आखिरी बात: इस नफरत के खेल का अंत क्या है?

हमले के बाद अभिषेक बनर्जी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि “मेरा सिर बच गया, लेकिन मेरा संकल्प नहीं झुकेगा।” उनके इस तेवर से साफ है कि आने वाले दिनों में टीएमसी और विपक्ष के बीच यह लड़ाई और ज्यादा आक्रामक होने वाली है।

लेकिन सवाल यह है कि आखिर कब तक बंगाल की जनता इसी डर और नफरत के साए में जीने को मजबूर रहेगी? चुनाव आते रहेंगे, सरकारें बदलती रहेंगी, लेकिन अगर राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं ने अपने कार्यकर्ताओं को संयम नहीं सिखाया और कानून के शासन का सम्मान नहीं किया, तो सोनारपुर की यह आग किसी दिन पूरे लोकतांत्रिक ढांचे को राख कर देगी। अब समय आ गया है कि सोशल मीडिया की ‘ट्विटर वॉर’ और खोखली बयानबाजी से ऊपर उठकर, सभी पार्टियां मिलकर इस बात पर मंथन करें कि बंगाल को इस अंतहीन हिंसा के दलदल से कैसे बाहर निकाला जाए।

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