AI Data Center से बढ़ेगी बिजली मांग, नेट-ज़ीरो में इंजीनियर अहम

AI Data Center से बढ़ेगी बिजली मांग, नेट-ज़ीरो में इंजीनियर अहम

AI Data Center से बढ़ेगी बिजली मांग, नेट-ज़ीरो पर बढ़ेगा दबाव

Dehradun, 24 February: एआई आधारित डेटा सेंटर, मैन्युफैक्चरिंग विस्तार और तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण के कारण भारत में आगामी दो दशकों में बिजली की मांग लगभग दोगुनी होने की संभावना है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करना वास्तविक चुनौती होगी। यह विचार पुणे स्थित MIT-World Peace University में आयोजित 29वें ‘एनुअल इंडस्ट्री-इंस्टीट्यूट इंटरएक्शन प्रोग्राम’ (एआईआईआईपी-26) के दौरान व्यक्त किए गए।

एसपीई एमआईटी-डब्ल्यूपीयू स्टूडेंट चैप्टर द्वारा आयोजित इस विशेष सत्र में वैश्विक ऊर्जा और प्रौद्योगिकी क्षेत्र की अग्रणी कंपनियों — BP, ExxonMobil, Baker Hughes, Chevron तथा Quorum Software — के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। “रिस्किल. रिवायर. रीइग्नाइट: कम कार्बन उत्सर्जन के लिए कुशल इंजीनियर” विषय पर आयोजित पैनल चर्चा में ऊर्जा संक्रमण की दिशा और चुनौतियों पर विस्तृत विचार-विमर्श हुआ।

भारत वर्तमान में विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देश है और वर्ष 2070 तक ‘नेट-ज़ीरो’ उत्सर्जन प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित कर चुका है। साथ ही 2005 के स्तर की तुलना में 45 प्रतिशत उत्सर्जन कमी का संकल्प भी लिया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस्पात, सीमेंट, परिवहन और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों के तीव्र विस्तार को देखते हुए ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना अत्यंत आवश्यक होगा।

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बीपी की ‘टेक्निकल सॉल्यूशंस इंडिया’ प्रमुख सुश्री मोली क्रोमा ने कहा कि कम कार्बन उत्सर्जन की दिशा में प्रगति चरणबद्ध होगी और इसकी शुरुआत कार्यक्षमता सुधार से होती है। उन्होंने जोर दिया कि मूल इंजीनियरिंग सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं, आवश्यकता केवल उनके प्रभावी और पर्यावरण-संवेदी उपयोग की है।

एक्सॉनमोबिल के इयान मैकफी ने ‘कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज’ को पारंपरिक इंजीनियरिंग कौशल का विस्तार बताते हुए कहा कि रिज़र्वॉयर इंजीनियरिंग और जियोसाइंस जैसी विशेषज्ञताएं तेल एवं गैस क्षेत्र की तरह ही कार्बन भंडारण में भी उपयोगी हैं। उनके अनुसार, मूलभूत सिद्धांत समान हैं, केवल अनुप्रयोग का उद्देश्य बदल गया है।

बेकर ह्यूजेस के प्रदीप शुक्ला ने कार्बन कैप्चर परियोजनाओं में भू-यांत्रिक अध्ययन और CO₂ भंडारण के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए कुओं की बढ़ती मांग का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि तकनीकी आधार वही है, लेकिन उसका उपयोग उत्सर्जन नियंत्रण की दिशा में किया जा रहा है।

शेवरॉन के चेतन चव्हाण ने संपूर्ण वैल्यू चेन में ‘कार्बन साक्षरता’ की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि इंजीनियरों को उत्सर्जन के स्रोत, निगरानी तकनीकों और नियामकीय मानकों की समग्र समझ विकसित करनी होगी। मजबूत तकनीकी आधार के साथ डिजिटल दक्षता और सिस्टम्स थिंकिंग को भी अनिवार्य बताया गया।

कोरम सॉफ्टवेयर की तितिक्षा मुखर्जी ने कार्बन प्रबंधन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की भूमिका रेखांकित करते हुए कहा कि एआई प्रक्रियाओं को तेज कर सकती है, परंतु इसे प्रभावी बनाने के लिए इंजीनियरों की सक्रिय निगरानी और रणनीतिक सोच आवश्यक है।

चर्चा के दौरान यह भी स्पष्ट किया गया कि क्लाउड कंप्यूटिंग और एआई के बढ़ते उपयोग के कारण डेटा सेंटरों की संख्या में तीव्र वृद्धि हो रही है। 24×7 बिजली आपूर्ति और उन्नत कूलिंग सिस्टम की आवश्यकता के चलते ये केंद्र ऊर्जा खपत के बड़े स्रोत बनते जा रहे हैं, जिससे भविष्य की ऊर्जा योजना पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा।

सत्र में उपस्थित विशेषज्ञों की इस बात पर सहमति रही कि ऊर्जा परिवर्तन एक दीर्घकालिक और बहुआयामी प्रक्रिया है। हाइड्रोकार्बन, सौर एवं पवन ऊर्जा, हाइड्रोजन, भू-तापीय ऊर्जा तथा कार्बन कैप्चर तकनीकों के संतुलित उपयोग से ही ऊर्जा सुरक्षा और उत्सर्जन नियंत्रण के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकेगा।

कार्यक्रम में छात्रों की सक्रिय भागीदारी भी देखने को मिली। विशेषज्ञों ने उन्हें इंजीनियरिंग के मूल सिद्धांतों के साथ डेटा साइंस, ऑटोमेशन और पर्यावरण प्रबंधन जैसे उभरते क्षेत्रों में दक्षता विकसित करने की सलाह दी, ताकि वे भविष्य की ऊर्जा चुनौतियों का प्रभावी समाधान प्रस्तुत कर सकें।

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