भारतीय वैज्ञानिकों ने खोजीं Black Fungus की दो अनोखी प्रजातियाँ
Pune, 11 September: धरती की मिट्टी में अब तक छिपे कई रहस्य धीरे-धीरे सामने आ रहे हैं। इन्हीं में से एक अहम खुलासा करते हुए पुणे स्थित एमएसीएस-अगरकर अनुसंधान संस्थान (ARI) के वैज्ञानिकों ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। शोधकर्ताओं ने पश्चिमी घाट की मिट्टी से ब्लैक फंगस (Black Fungus) की दो नई प्रजातियों की खोज की है।
नई प्रजातियों के नाम Aspergillus dhakephalkarii और Aspergillus patriciawiltshireae रखे गए हैं। यह पहली बार है जब भारतीय वैज्ञानिकों ने फंगस की नई प्रजातियों की पहचान कर उनका वैज्ञानिक नामकरण किया है। इसके साथ ही, टीम ने भारत में पहली बार दो और दुर्लभ प्रजातियों “A. aculeatinus” और “A. brunneoviolaceus” की मौजूदगी भी दर्ज की है।
कैसे हुई पहचान
इस खोज के लिए वैज्ञानिकों ने डीएनए-आधारित आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया। ITS, CaM, BenA और RPB2 जैसे जीन्स का गहन विश्लेषण किया गया और बहु-जीन फाइलोजेनेटिक एनालिसिस (multi-gene phylogenetic analysis) से पुष्टि की गई कि ये वाकई नई प्रजातियाँ हैं।

नई Black Fungus प्रजातियों की खासियत
- Aspergillus dhakephalkarii: तेजी से बढ़ने वाली यह फंगस हल्के से गहरे भूरे रंग की होती है और इसमें पीले-नारंगी रंग के छोटे स्क्लेरोटिया (गांठ जैसी संरचना) पाए जाते हैं।
- Aspergillus patriciawiltshireae: इसकी कॉलोनियाँ भी बहुत तेज़ी से बढ़ती हैं और यह भी पीले-नारंगी स्क्लेरोटिया बनाती है, हालांकि इसकी बनावट इसे अन्य प्रजातियों से अलग करती है।
क्या होंगे फायदे
- उद्योग और खेती में बदलाव: ये फंगस साइट्रिक एसिड जैसे अहम बायोकेमिकल्स बनाने में सहायक हो सकती हैं और जैविक खेती में फॉस्फेट को घुलनशील बनाने में मददगार साबित हो सकती हैं।
- नई दवाओं की खोज: कई फंगस एंटीबायोटिक्स और अन्य दवाओं का आधार होती हैं। ये नई प्रजातियाँ चिकित्सा अनुसंधान में नए अवसर खोल सकती हैं।
- पर्यावरण संरक्षण: यह खोज दर्शाती है कि हमारी मिट्टी में अभी भी अनदेखी जैव विविधता मौजूद है, जिसे बचाना बेहद जरूरी है।
- वैज्ञानिक क्षमता का प्रदर्शन: यह उपलब्धि दिखाती है कि भारत अब वैश्विक स्तर पर फंगस वर्गीकरण जैसे जटिल क्षेत्रों में भी अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
शोध टीम
इस शोध का नेतृत्व डॉ. राजेश कुमार के.सी., डॉ. हरिकृष्णन के. और डॉ. रवींद्र एम. पाटिल ने किया। यह परियोजना ARI पुणे में पूरी हुई, जिसे भारत सरकार के ANRF (पूर्ववर्ती SERB) ने वित्तीय सहयोग दिया।

