उत्तराखंड की गढ़वाली-कुमाऊँनी-जौनसारी भाषाओं को AI से जोड़ने की पहल, CM धामी की आवाज से शुरू हुआ अभियान
देहरादून | 23, अक्टूबर, 2026
उत्तराखंड की लोकभाषाओं को डिजिटल दुनिया में नई पहचान दिलाने के लिए ‘भाषा AI’ पहल शुरू की गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गुरुवार को मुख्यमंत्री कैंप कार्यालय में गढ़वाली, कुमाऊँनी और जौनसारी भाषाओं के वॉइस कलेक्शन पोर्टल का शुभारंभ किया। अभियान की शुरुआत मुख्यमंत्री की कुमाऊँनी भाषा में रिकॉर्ड की गई वॉइस क्लिप से हुई। इस पहल का उद्देश्य प्रदेश की लोकभाषाओं को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जोड़कर उनका संरक्षण करना और डिजिटल माध्यमों पर उनका इस्तेमाल बढ़ाना है।
लोकभाषाओं के संरक्षण में AI की भूमिका अहम
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि बोली-भाषाएं हमारी सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनके संरक्षण और संवर्धन के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग जरूरी है। उन्होंने कहा कि AI का दायरा लगातार बढ़ रहा है, ऐसे में उत्तराखंड की क्षेत्रीय भाषाओं को भी इस तकनीक के अनुरूप विकसित करना होगा, ताकि राज्य की भाषाई विरासत को वैश्विक स्तर पर पहचान मिल सके।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार का प्रयास है कि दूरदराज के गांवों में रहने वाले लोग भी अपनी स्थानीय भाषा के माध्यम से सरकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त कर सकें और अपनी समस्याएं सरकार तक पहुंचा सकें। इसके लिए AI का स्थानीय भाषाओं को सही ढंग से समझना जरूरी है।
शब्दों के साथ उच्चारण और बोलने की शैली भी होगी दर्ज
‘भाषा AI’ पहल के तहत गढ़वाली, कुमाऊँनी और जौनसारी भाषाओं के शब्दों और आवाजों का संग्रह तैयार किया जा रहा है। पोर्टल के माध्यम से लोगों की आवाज और स्थानीय बोलियों के नमूने एकत्र किए जाएंगे, ताकि AI इन भाषाओं के शब्दों, उच्चारण और बोलने की अलग-अलग शैलियों को समझ सके।
मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखंड में एक ही शब्द का उच्चारण अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरीके से किया जा सकता है। ऐसे में स्थानीय भाषाओं की विविधता को डिजिटल रूप में दर्ज करना जरूरी है। इससे भविष्य में AI आधारित सेवाओं को स्थानीय भाषा में अधिक सटीक और सहज बनाने में मदद मिल सकती है।
पद्मश्री प्रीतम भरतवाण भी करेंगे सहयोग
कार्यक्रम में पद्मश्री लोकगायक प्रीतम भरतवाण ने कहा कि उत्तराखंड की लोकभाषाओं में लोकजीवन, लोकगीत, जागर और सांस्कृतिक परंपराओं की समृद्ध विरासत समाहित है। उन्होंने बताया कि जागर अकादमी इस पहल में स्थानीय भाषाओं के सही उच्चारण और उनकी मौलिकता को बनाए रखने में सहयोग करेगी।
वहीं, AISE फाउंडेशन के संस्थापक सचिदानंद सेमवाल ने बताया कि ‘भाषा AI’ के माध्यम से तीनों लोकभाषाओं के शब्दों और आवाजों का डिजिटल संग्रह तैयार किया जा रहा है। इसका लक्ष्य भविष्य में AI आधारित तकनीक को इन भाषाओं में संवाद करने में सक्षम बनाना है।
आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचेगी भाषाई विरासत
यह पहल उत्तराखंड की लोकभाषाओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर स्थान देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। स्थानीय शब्दों, उच्चारणों और बोलने की शैलियों का संग्रह तैयार होने से भविष्य में भाषा आधारित डिजिटल सेवाओं के विकास में मदद मिल सकती है। साथ ही, नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
कार्यक्रम में शक्ति प्रसाद भट्ट, गजेंद्र नौटियाल, अनिरुद्ध रैथवान, निधि सेमवाल, अनिल गोदियाल, डॉ. जे.के. पांडे और देव रतूड़ी सहित अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
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