चारधाम यात्रा अब और सुरक्षित: हाईटेक निगरानी से पहले ही मिलेगा खतरे का संकेत
Dehradun, 04 May: देवभूमि उत्तराखंड की पवित्र चारधाम यात्रा हर साल लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनती है। लेकिन पहाड़ों की अनिश्चित प्रकृति—कभी भूस्खलन, तो कभी अचानक बादल फटने की घटनाएं—इस यात्रा को चुनौतीपूर्ण भी बना देती हैं। ऐसे में अब केंद्र सरकार ने यात्रियों की सुरक्षा को एक नए स्तर पर ले जाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है।
सरकार ने चारधाम मार्ग के सबसे संवेदनशील लगभग 100 किलोमीटर हिस्से पर अत्याधुनिक उपग्रह आधारित निगरानी प्रणाली तैनात करने की योजना शुरू की है। इस हाईटेक सुरक्षा कवच में इंटरफेरोमेट्रिक सिंथेटिक अपर्चर रडार (InSAR) और लिडार जैसी उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे प्राकृतिक आपदाओं का पहले ही अंदाजा लगाया जा सकेगा।
कैसे बदलेगी यात्रा की सुरक्षा तस्वीर?
अब तक यात्रियों को अचानक रास्ता बंद होने या भूस्खलन की स्थिति का सामना करना पड़ता था। कई बार लोग घंटों या दिनों तक रास्तों में फंसे रहते थे। नई प्रणाली इन जोखिमों को पहले ही पहचानकर प्रशासन को सतर्क करेगी, जिससे समय रहते रेस्क्यू और वैकल्पिक इंतजाम संभव हो पाएंगे।
इस महत्वाकांक्षी परियोजना में Indian Institute of Technology Roorkee, THDC India Limited और Geological Survey of India जैसे प्रमुख संस्थान तकनीकी सहयोग दे रहे हैं। इसके साथ ही ड्रोन के जरिए भी लगातार सर्वेक्षण किया जा रहा है, ताकि संवेदनशील क्षेत्रों की सटीक पहचान हो सके।
InSAR तकनीक: खतरे का पहले ही संकेत
InSAR एक ऐसी सैटेलाइट आधारित तकनीक है जो जमीन की बेहद मामूली हलचल को भी पकड़ सकती है। यह किसी क्षेत्र की बार-बार ली गई तस्वीरों की तुलना करके यह पता लगाती है कि कहीं जमीन धीरे-धीरे खिसक तो नहीं रही या दरार तो नहीं बन रही।
यानी, अगर किसी पहाड़ी ढलान पर भूस्खलन की संभावना बन रही हो, तो यह तकनीक पहले ही चेतावनी दे देगी—और यही समय प्रशासन के लिए सबसे कीमती होता है।
लिडार तकनीक: पहाड़ों का थ्रीडी नक्शा
लिडार (LiDAR) तकनीक लेजर आधारित मैपिंग सिस्टम है, जो जमीन की बेहद सटीक 3D इमेज तैयार करती है।
इससे यह समझने में आसानी होती है कि कौन-से इलाके ज्यादा संवेदनशील हैं, कहां पानी का बहाव ज्यादा है, और किस ढलान पर खतरा अधिक है। यही डेटा भविष्य की सुरक्षा रणनीति तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।
क्यों जरूरी है यह पहल?
चारधाम—गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ—की यात्रा हर साल मानसून और बदलते मौसम के बीच होती है। ऐसे में जोखिम भी बढ़ जाता है। नई तकनीक न सिर्फ हादसों को कम करेगी, बल्कि यात्रियों को एक सुरक्षित और भरोसेमंद अनुभव भी देगी।
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