CBSE का नया निर्देश: स्कूलों में दादा-दादी, नाना-नानी की एंट्री, पीढ़ियों के बीच रिश्ता होगा और मजबूत
New Delhi/Dehradun, 04 February: तेज़ रफ्तार ज़िंदगी, मोबाइल में उलझे बच्चे और घरों में बढ़ता बुज़ुर्गों का अकेलापन — आज का समाज इसी सच्चाई से जूझ रहा है। ऐसे समय में स्कूलों को सिर्फ़ पढ़ाई तक सीमित न रखकर उन्हें संवेदनाओं और रिश्तों को जोड़ने का मंच बनाने की पहल की गई है। इसी सोच के तहत CBSE ने सभी स्कूलों को निर्देश दिए हैं कि वे बच्चों और उनके दादा-दादी/नाना-नानी के बीच पीढ़ियों के रिश्ते मज़बूत करने वाले कार्यक्रम शुरू करें, ताकि सीख सिर्फ़ किताबों से नहीं, अनुभवों से भी मिले।
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की ओर से प्रोफेसर एवं निदेशक (अकादमिक्स) डॉ. प्रज्ञा एम. सिंह ने स्कूलों को यह निर्देश जारी किए हैं। बोर्ड की ओर से यह निर्देश राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक परिषद की सिफारिशों और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के मार्गदर्शन के आधार पर जारी किए गए हैं। CBSE ने स्कूलों में बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों के बीच भावनात्मक जुड़ाव बढ़ाने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके तहत स्कूलों को राष्ट्रीय पर्वों, बाल दिवस और अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस जैसे अवसरों पर छात्रों के दादा-दादी/नाना-नानी को आमंत्रित करने की सलाह दी गई है।
इसके अलावा, बुज़ुर्गों के अकेलेपन को कम करने और सामाजिक सहभागिता बढ़ाने के उद्देश्य से वॉकाथॉन जैसे साझा कार्यक्रम आयोजित करने को भी कहा गया है। बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि सभी गतिविधियां सम्मानजनक और समावेशी हों तथा आवश्यक होने पर संबंधित विभागों को पूर्व सूचना दी जाए।
क्या है CBSE का नया रोडमैप?
राष्ट्रीय आयोजनों में बुज़ुर्गों की भागीदारी
स्कूलों को सलाह दी गई है कि वे स्वतंत्रता दिवस, बाल दिवस, अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस जैसे आयोजनों में विद्यार्थियों के दादा-दादी/नाना-नानी को आमंत्रित करें।
इससे छात्रों में सम्मान, भावनात्मक जुड़ाव और मानवीय मूल्य विकसित होंगे।
वॉकाथॉन जैसे साझा कार्यक्रम
दिशा-निर्देशों में ऐसे कार्यक्रमों को बढ़ावा देने की बात कही गई है, जहां **बुज़ुर्ग और बच्चे साथ चलें।
इसका मकसद वरिष्ठ नागरिकों में अकेलेपन और सामाजिक अलगाव** की भावना को कम करना है।
गरिमा और समावेशन अनिवार्य
CBSE ने साफ किया है कि सभी गतिविधियां सम्मानजनक और समावेशी माहौल में हों।
जहां आवश्यक हो, स्कूलों को पहले संबंधित विभागों को सूचना देने और गतिविधियों का रिकॉर्ड रखने के निर्देश भी दिए गए हैं।
क्यों है यह पहल जनहित में अहम?
- संयुक्त परिवारों के टूटने से बुज़ुर्गों का अकेलापन बढ़ा
- बच्चों में संवेदनशीलता और सामाजिक समझ का विकास
- बुज़ुर्गों के अनुभवों से छात्रों को जीवन मूल्य सीखने का मौका
- स्कूल सिर्फ़ पढ़ाई नहीं, सामाजिक बदलाव का केंद्र बनेंगे
शिक्षा से सामाजिक सरोकार तक
साईग्रेस एकेडमी इंटरनेशनल देहरादून के निदेशक समरजीत सिंह ने बताया कि यह पहल सिर्फ़ एक गतिविधि नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच संवाद को फिर से जीवित करने की कोशिश है। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो स्कूल बुज़ुर्ग-अनुकूल समाज बनाने की दिशा में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
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