कुर्सी की चमक में खो जाएं तो सेवा का मकसद ही मिट जाता है
Opinion | June 19, 2026
Abhishek Gaur | Independent Writer
आज के दौर में पद को अक्सर पहचान समझ लिया जाता है। किसी से परिचय पूछिए तो कई लोग अपना नाम बताने से पहले अपना पद बताते हैं। कोई कहता है, “मैं अधिकारी हूँ”, कोई कहता है, “मैं नेता हूँ”, तो कोई अपने पद को ही अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मान लेता है। लेकिन सच यह है कि पद किसी व्यक्ति की पहचान नहीं, बल्कि उसके कंधों पर रखी गई एक ज़िम्मेदारी है। जब पद को पहचान बना लिया जाता है, तो सेवा का भाव पीछे छूट जाता है और अहंकार आगे आ जाता है।
पद आया है, एक दिन जाएगा भी
दुनिया का कोई भी पद स्थायी नहीं है। इतिहास और वर्तमान दोनों इसके गवाह हैं। जो लोग कभी ऊँचे पदों पर बैठे थे, समय के साथ वे सामान्य जीवन में लौट आए। लेकिन लोगों को उनकी कुर्सी नहीं, उनके कर्म याद रहे। जिन्होंने अपने पद का उपयोग समाज और लोगों के हित में किया, उन्हें आज भी सम्मान के साथ याद किया जाता है। वहीं जिन्होंने पद का इस्तेमाल केवल शक्ति प्रदर्शन और निजी स्वार्थ के लिए किया, उनकी पहचान समय के साथ धूमिल हो गई।
असल में पद समाप्त हो सकता है, लेकिन कर्मों का प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है। इसलिए व्यक्ति को अपने पद से नहीं, अपने कार्यों से पहचाना जाना चाहिए।
ज़िम्मेदारी का असली अर्थ
हर पद अपने साथ एक विशेष भरोसा लेकर आता है। एक शिक्षक के हाथों में छात्रों का भविष्य होता है। एक अधिकारी के हाथों में व्यवस्था और कानून का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी होती है। एक जनप्रतिनिधि के पास जनता की उम्मीदें होती हैं। ऐसे में पद का अर्थ विशेषाधिकार नहीं, बल्कि जवाबदेही होना चाहिए।
जब कोई व्यक्ति सोचता है कि पद उसे दूसरों से बड़ा बनाता है, तब निर्णयों में अहंकार और स्वार्थ झलकने लगता है। लेकिन जब वही व्यक्ति यह समझता है कि समाज ने उस पर भरोसा किया है, तब उसके निर्णयों में संवेदनशीलता, निष्पक्षता और जनहित दिखाई देता है।
सम्मान पद से नहीं, व्यवहार से मिलता है
आज समाज में यह प्रवृत्ति बढ़ती दिखाई देती है कि छोटा सा पद मिलते ही कुछ लोगों का व्यवहार बदल जाता है। वे अपने आसपास एक ऐसी दूरी बना लेते हैं, जिससे आम लोग सहज महसूस नहीं करते। पद का रौब दिखाना आसान है, लेकिन लोगों का विश्वास जीतना कठिन।
इसके विपरीत, ऐसे भी अनेक उदाहरण हैं जहाँ बड़े पदों पर बैठे लोगों ने अपनी सादगी और विनम्रता नहीं छोड़ी। ऐसे लोगों का सम्मान केवल उनके कार्यकाल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे लंबे समय तक लोगों के दिलों में जगह बनाए रखते हैं। यह सम्मान किसी आदेश या अधिकार से नहीं, बल्कि व्यवहार और कार्यशैली से अर्जित होता है।
सादगी ही सबसे बड़ी पहचान
दुनिया के अनेक महान व्यक्तित्वों ने यह साबित किया है कि ऊँचा पद और विनम्र स्वभाव एक साथ चल सकते हैं। चाहे महात्मा गांधी हों या भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, इन व्यक्तित्वों ने पद को कभी अपनी पहचान नहीं बनने दिया। उन्होंने अपने दायित्वों को सेवा का माध्यम माना और यही कारण है कि आज भी उन्हें सम्मान और प्रेरणा के साथ याद किया जाता है।
उनकी सबसे बड़ी ताकत पद नहीं, बल्कि उनका चरित्र, सादगी और लोगों के प्रति समर्पण था।
पद एक साधन है, साध्य नहीं। यह समाज की सेवा करने का अवसर है, स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने का मंच नहीं। यदि हम अपनी पहचान केवल पद से जोड़ लेंगे तो पद समाप्त होते ही पहचान भी कमजोर पड़ जाएगी। लेकिन यदि हम अपनी पहचान कर्म, व्यवहार और ईमानदारी से बनाएंगे, तो पद समाप्त होने के बाद भी लोग हमें सम्मान से याद करेंगे।
समाज को आज ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो यह न कहें कि “मैं अमुक पद पर हूँ”, बल्कि यह कहें कि “मुझे अमुक ज़िम्मेदारी निभाने का अवसर मिला है।” यही सोच किसी भी पद को वास्तव में सार्थक बनाती है।
— अभिषेक गौड़, स्वतंत्र लेखक
अस्वीकरण: यह लेख लेखक के निजी विचार हैं। The India Vox इन विचारों से आवश्यक रूप से सहमत हो, यह जरूरी नहीं है।
