चमोली: मां नंदा की कैलाश यात्रा अब पहुंची उच्च हिमालय की दहलीज, शुक्रवार को वेदनी कुंड में होगा पवित्र स्नान
वेदनी बुग्याल में 11,004 फीट की ऊंचाई पर निभाई जाएगी देवी-देवताओं के स्नान की परंपरा, लाटू देवता निभाते हैं मार्गदर्शक की भूमिका
चमोली | 17 सितंबर, 2026
हिमालय की बेटी और आराध्य मां नंदा की लोकजात यात्रा अब आबादी वाले क्षेत्रों को पीछे छोड़ते हुए उच्च हिमालय की निर्जन वादियों की ओर बढ़ रही है। कठिन पहाड़ी रास्तों और दुर्गम पड़ावों को पार करती यह यात्रा अब उस मुकाम पर पहुंच रही है, जहां आस्था, लोकविश्वास और हिमालयी प्रकृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
गुरुवार को मां नंदा की जात गेरौली पातल में विश्राम करेगी। इसके बाद शुक्रवार को लोकजात यात्रा वेदनी बुग्याल पहुंचेगी। समुद्र तल से करीब 11,004 फीट की ऊंचाई पर स्थित वेदनी कुंड मां नंदा की लोकजात यात्रा के प्रमुख धार्मिक पड़ावों में शामिल है। यहां देवी-देवताओं के पवित्र स्नान की परंपरा निभाई जाएगी।
महिषासुर से जुड़ी है वेदनी कुंड की मान्यता
लोकमान्यता के अनुसार, कैलाश यात्रा के दौरान मां नंदा ने महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था और उसके शरीर को वेदनी कुंड में डाल दिया था। इसी धार्मिक और पौराणिक मान्यता के कारण वेदनी कुंड श्रद्धालुओं के लिए महज एक जलस्रोत नहीं, बल्कि मां नंदा की शक्ति और उनकी कैलाश यात्रा से जुड़ा महत्वपूर्ण आस्था स्थल माना जाता है।
वेदनी में होने वाली पूजा-अर्चना को लेकर भी स्थानीय लोकविश्वास गहरे जुड़े हैं। मान्यता है कि इस पवित्र स्थल पर मां नंदा की पूजा के दौरान हिमालय के आराध्य भगवान शिव की उपस्थिति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसी आस्था के चलते कठिन और दुर्गम रास्तों के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालु वेदनी पहुंचते हैं।
वेदनी से देवराड़ा लौटती हैं मां नंदा
वेदनी में पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के बाद मां नंदा की वापसी उनके ननिहाल देवराड़ा की ओर होती है। लोकविश्वास में देवराड़ा को मां नंदा का मायका माना जाता है। यहां मां नंदा के प्रवास और पूजा-अर्चना की परंपरा निभाई जाती है।
वेदनी से मां नंदा की वापसी का यह चरण भी श्रद्धालुओं के लिए भावनात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
पितरों के लिए श्राद्ध और तर्पण की भी परंपरा
वेदनी कुंड में मां नंदा की पूजा के साथ पितरों के निमित्त श्राद्ध और तर्पण करने की भी परंपरा है। वेदनी कुंड के पुजारी देवी दत्त कुनियाल के अनुसार, स्थानीय मान्यता है कि यहां किया गया पितृ तर्पण सीधे पितृलोक तक पहुंचता है। इस वजह से लोकजात में शामिल श्रद्धालु देवी-देवताओं की आराधना के साथ अपने पूर्वजों को भी श्रद्धापूर्वक याद करते हैं।
वाण से शुरू होती है निर्जन हिमालयी यात्रा
उच्च हिमालय की ओर बढ़ने से पहले वाण गांव मां नंदा की लोकजात का अंतिम आबाद पड़ाव माना जाता है। यहां मां नंदा के धर्मभाई लाटू देवता का मंदिर स्थित है।
लोकमान्यता के अनुसार, मां नंदा ने लाटू देवता को अपना धर्मभाई मानकर आगे की कठिन और निर्जन यात्रा की अगुवाई का दायित्व सौंपा था। यही वजह है कि वाण से आगे कैलाश की दिशा में बढ़ने वाली लोकजात यात्रा में लाटू देवता को मार्गदर्शक के रूप में विशेष महत्व दिया जाता है।
हिमालय बनेगा आस्था के इस पड़ाव का साक्षी
वेदनी बुग्याल की प्राकृतिक सुंदरता इस धार्मिक यात्रा को और खास बना देती है। चारों ओर फैले हरे-भरे बुग्याल, सामने दिखाई देती त्रिशूली और नंदा घुंघुटी की चोटियां और बीच में स्थित वेदनी कुंड—लोकजात के इस पड़ाव को आध्यात्मिक और प्राकृतिक दोनों दृष्टि से विशेष बनाते हैं।
शुक्रवार को वेदनी कुंड में होने वाला देवी-देवताओं का पवित्र स्नान मां नंदा की लोकजात यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ावों में से एक होगा। यहां आस्था, लोकपरंपरा, पौराणिक मान्यताओं और हिमालयी प्रकृति का अनूठा संगम देखने को मिलेगा।
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